तोपां रो मुक़ाबलों तलवारां सूं
एक ऐसा युद्ध जिसमें मरुधरा के वीरों ने तोपों का मुक़ाबला तलवारो से किया । इस युद्ध में जो वीरता ओर बलिदान की गाथा लिखी गयी थी वह आज भी गीतों में गाई जाती है ।
जब राजपूताना पर मुग़ल साम्राज्य के पतन के पश्चात राजपूत राजा अपने ग्रह के क्लेशों में व्यस्त थे,तब अखण्ड भारत का सपना देखने वाले महाराजा शिवाजी के वीर उतराधिकारी जो उनकी नितियो के विपरीत ग्रह युद्धो में व्यस्त राजपूताना के राजाओं के क्लेशों को शांत करने के बजाय वे एक एक कर दोनो पार्टियों के लोगों के समर्थन में रुपयों के लालच में आकर खड़े होने लगे थे । ये एक ऐसा समय था जब भाई भाई का दुश्मन ओर मराठों की राजस्थान में लुट मची थी ।जब मन चाहा चल पड़े ओर चोथ वसुली की ओर वापस लोट गये । इतनी लुट पाट तो मुग़लों के समय भी नहीं हुई होगी , जितनी मराठा ओर पिंडारीयो ने की थी । मराठों ने मारवाड़ पर 1750 के बाद लगातार 1791 के तुंगा तक अनेक आक्रमण किये जिससे एक समय मारवाड़ के प्रत्येक घर में युवाओं की कमी हो गयी । दो दो। पीढ़ी पुरी इन युद्धो में काम आ गयी । मारवाड़ के प्रत्येक गाँव में मराठों से युद्ध कर काम आने वाले वीरों के स्मारक आज भी इसकी गवाही दे रहे है ।
मारवाड़ का एक वीर योद्धा भीमसिंह पातावत का ज़िक्र ना हो तो मराठा इतिहास ही अधूरा लगता है । बीकानेर की दक्षिणी सीमा पर पातापट्टी के पातावत भीम सिंहजी उस समय रेगिस्तानी प्रदेश का बड़ा प्रसिद्ध जुँझारु वीर था जिसका डंका पुरे चोथाले में बजता था ।
जोधपुर महाराजा विजय सिंह जी के समय मराठा सेनापति डीबोईंन के नेतृत्व में मेड़ता के युद्ध में राठौड़ो से लड़ने पहुँचे यह युद्ध बड़ा भयंकर था । मारवाड़ के राठौर वीर भीमसिंह पातावत अपने पाँच सौ योद्धाओ के साथ ओर आसोप के ठाकुर महेशदास अपने वीरों के साथ युद्ध करने पहुँचे । मराठा फ़्रांसीसी सेनापति डीबोईंन के साथ आधुनिक तोपो के बेड़े के साथ युद्ध भूमि पर पहुँचे । राठौड़ो ने घोड़ों पर असवार होकर हाथो में तलवारें थामे बड़ी तेज़ी से आगे बढ़े । देखते ही देखते राजपूत वीरों ने युद्ध में घमासान मचा दिया । डीबोईंन तोपो के नीचे छिप गया , पलक जपकते ही पातावत भीम जी ओर महेशदास जी ने अपने वीरो के साथ तोपों पर तलवारों से वार कर तोपो के मुँह मेड़ता की वेकलु रेत मे गाड़ दिये । पल भर में तोपौ पर राठौड़ो का अधिकार हो गया । मराठा अपनी जान बचा कर भागे ।
डीबोईंन भी जान बचाकर भागा । मारवाड़ के प्रसिद्ध कवि राघवदास रोहड़ीया नै उसकी मनोदसा का बड़ा सुंदर वर्णन किया हैं –
भीमा रघुकुल भाण ,
भीम अजय बळ भारता।
पाता बगसौ प्राण ,
मुख नह करसां मेड़ता ॥
मथानिया के कवि गिरधरदासजी रोहड़ीया ने भीम जी की प्रशंसा में इस भाँत लिखा हैं –
चाकर थापन चालिया ,
सिंहा नै दळ स्याळ ।
गढ़पती बणगी गाडरां ,
मरुधर कोण रूखाळ ॥
मरहठे हठ माँडियो,
लुटण मरुधर लाज ।
चढ़ियो सो नह चूकसी ,
सिन्धिया माधवराज ॥
प्रिथमी सारी पालटी ,
बास बसै बिकाण ।
पाता कदै न पालटै ,
भीमा जिसा कुळभाण ॥
शीश रखे तो नाक तज ,
नाक रखे तज शीश ।
भीमा जो मनभावती ,
लिख दे मरुधरधीश ॥
महाराजा विजय सिह जी पातावतो की वीरता से इतने प्रभावित हुए की उन्होंने सुझानगढ़ का क्षेत्र बीकानेर को देकर पातापट्टी को मारवाड़ में मिला दिया ओर अपने राज्य की इस सीमा से वे निष्कंटक हो गये ।









