तोमर सम्राट अनंगपाल द्वितीय (1051-1081 ई.)
अनंगपाल तोमर द्वितीय:-
1051 ई. में दिल्ली के राजसिंहासन पर सम्राट अनंगपाल द्वितीय बैठे। मेहरौली के लौह स्तम्भ पर एक लेख प्राप्त हुआ उसके अनुसार वि.सं. 1109 अर्थात् 1052 ई. में अनंगपाल दिल्ली पर राज्य कर रहे थे।

राजधानी बदलना:-
अनंगपाल ने अपनी राजधानी अनंगपुर से हटाकर योगिनीपुर और महिपालपुर के बीच स्थित ढिल्लिकापुरी में स्थापित की। तोमरों के समय में उनकी राजधानी बदलती रहती थी। द्विवेदी जी के अनुसार अनंगपाल द्वितीय के पूर्व ही इस ढिल्लिका में कुछ मन्दिर और भवन बने हुए थे। अपने राज्य के दूसरे वर्ष में ही अनंगपाल ने लोह स्तम्भ(Iron Pillar) की स्थापना की थी। लौहस्तम्भ(Iron Pillar) को ही आधार बनाकर अनेक निर्माण कार्य करवाये ओर लालकोट नामक किला बनवाया गया।
उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्य(Available Historical Facts):-
कुव्वतुल-इस्लाम के शिलालेख के अनुसार और एक अनुश्रुति से ज्ञात होता है कि अनंगपाल द्वितीय ने 27 महल और मन्दिर बनवाये थे। इनमें से कुछ महल व मंदिर पहले बने हुए थे। अनंगपाल ने लौह स्तम्भ के समीप ही अनंगपाल नामक सरोवर भी बनवाया, इसकी लम्बाई उत्तर-दक्षिण में 169 फुट और पूर्व-पश्चिम में 152 फुट है। इस तालाब से थोड़ी दूर तक विशाल भवन था जो लौह स्तम्भ के घेरे हुए था। इन सब निर्माणों में चारों और लालकोट गढ़ बनवाया गया था। अनंगपाल ने ये निर्माण कार्य किस काल में करवाया इसके कुछ संकेत लौह स्तम्भ(Iron Pillar) 1052 ई. में दिल्ली लाया गया था ऐसा उसमें उत्कीर्ण लेख से प्रकट होता है। कनिंघम ने उस लेख को पढ़ा था जिसका सही अर्थ सन्नति दिहाली 1109 अनंगपाल बही संवत् 1109 अर्थात् 1052 ई. में लौह स्तम्भ को दिल्ली लाया गया। उस समय दिल्ली में विक्रम संवत् प्रचलित हो गया था उसके पूर्व वल्लभी संवत् प्रयुक्त होता था। यह लेख अनंगपाल ने स्वयं नहीं उत्कीर्ण करवाया था जबकि लौह स्तम्भ को दिल्ली ढोकर लाने वाले कारीगर ने खुदवा दिया था।
“दिल्ली के तोमर” पुस्तक में द्विवेदी जी के अनुसार 1052 ई. में प्रारम्भ होकर वे निर्माण 1067 ई. तक चलते रहे। गढ़वाल की पोथी के अनुसार संवत् 1117 मार्गशीर्ष सुदी दशम, 1060 ई. को लालकोट का निर्माण पूर्ण हुआ। वि.सं. 1124 (1067 ई.) तक मन्दिर और भवन बन रहे थे, ऐसा कथन कारीगर के लेख से स्पष्ट है।
यह वही लौह स्तम्भ है जिसे रासोकारों ने अनंगपाल प्रथम से जोड़ा है जो सही नहीं है क्योंकि इसे अनंगपाल द्वितीय ने दिल्ली में स्थापित किया था। अनेक इतिहासकारों का अभिमत है कि लौह स्तम्भ पहले मथुरा में था और वहां से लाकर दिल्ली में स्थापित किया गया। शूरवीरसिंह पंवार ने अपने लेख में इसे देहरादून जिले के जौनसार बाबर तहसील में स्थित बताया है और वहां से लाकर दिल्ली में स्थापित किया परन्तु द्विवेदी ने अपना मत मथुरा पर ही दिया है जिसे मानना ही उचित होगा। पद्मावती कान्तिपुरी और मथुरा के सम्राट अधिराज भवनाग ने यह लौह स्तम्भ मथुरा के उस विशाल विष्णु मन्दिर के सामने स्थापित किया जो 1050 ई. में बने केशवदेव के मन्दिर के स्थान पर बना हुआ था और जिसे महमूद ने तोड़ दिया। 1050 ई. में कुमारपाल नगरकोट के तुर्कों से जूंझ रहे थे। उस समय उनके राजकुमार मथुरा की रक्षा के लिए नियुक्त थे। उन्होंने विष्णु के प्राचीन मन्दिर के अवशेषों में इस विष्णु ध्वज को देखा और उसे दिल्ली लाने का उपक्रम किया। सम्भव है इसे जल मार्ग से लाया गया हो, उल्टीधार में नाविक धार खे लेते हैं। इस प्रकार यह लौह स्तम्भ दिल्ली लाया गया और महरौली में इसे स्थापित किया गया। इसी समय अनंगपाल ने अपनी मुद्राएं भी चलाई जो इस लौह स्तम्भ के समय ढाली गई थी।
इब्राहिम से युद्ध:-
1059 में गजनी का सुल्तान इब्राहिम बना। यह मसऊद का दूसरा पुत्र था। मध्ययुगीन इतिहास लेखकों का कथन है कि इब्राहिम ने तंवरहिन्दा पर आक्रमण कर उसे जीत लिया था, यह तंवरहिन्दा सिरसागर ही हैं , वह तोमरों के राज्य में ही था|
यह भी उल्लेख प्राप्त होता है कि इब्राहीम ने रूपाल (नूरपुर) को विजय किया था।
यह रूपाल तोमरों का ही गढ़ था जहां पर दिल्ली के तोमरों के वंशज राज्य कर रहे थे।
इब्राहिम अनंगपाल द्वितीय का समकालीन था।
केशवदास ने अपने पूर्वजों का इतिहास लिखते समय कविप्रिया में लिखा है-
जगपावन वैकुण्ठपति रामचन्द्र यह नाम।
मथुरा-मण्डल में दिये, तिन्हें सात सौ ग्राम।।
सोमवंश यदुकुल कलश त्रिभुवनपाल नरेश।
फरिदिये कलि कालपुर, तेई तिन्हें सुदेश।।
द्विवेदीजी के अनुसार यह त्रिभुवनपाल नरेश और कोई नहीं अनंगपाल द्वितीय ही थे। जब मथुरा ध्वस्त हो गई तो उसकी रक्षा का भार इस धनाढ्य कुल को देकर सात सौ ग्राम की जागीर का सामन्त बनाया। यह कुल शास्त्री जीवी ही नहीं थे, यह समरशूर शस्त्री भी थे।
संभवतः केशवदास सोमवंश यदुकुल कलश तोमर राजाओं के लिए ही लिखते थे और ‘त्रिभुवन पाल नरेश’ अनंगपाल द्वितीय ही थे।
ऐसा भी अनुमान है कि तहनगढ़ या त्रिभुवन गिरी को भी तोमर अनंगपाल द्वितीय ने ही बसाया था, बयाना से 14 मील और करौली से उत्तर पूर्व में 24 मील स्थित यह गढ़ तोमरों के लिए सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था।
तोमरगढ़ से ऐसाह और दिल्ली के बीच होने के कारण भी इसका महत्व था इसलिए अनंगपाल ने वहां पर अपना सामन्त स्थापित किया होगा।
अनंगपाल द्वितीय के समय श्रीधर ने पार्श्वनाथ चरित नामक पुस्तक की रचना की थी उसमें अपने आश्रयदाता नट्टुल साहु का बखान करने के पश्चात् दिल्ली का भी वर्णन किया है।
इसमें अनंगपाल ने किसी हमीर को पराजित किया उससे सम्बन्धित कुछ पंक्तियां लिखी जिनका अर्थ विद्वानों ने अलग-अलग दिया है।
द्विवेदीजी की पुस्तक “दिल्ली के तोमर” में द्विवेदीजी ने अपभ्रंश के माने हुए विद्वान, विश्व भारती, शान्ति निकेतन के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ. रामसिंह तोमर से जो श्रीधर पार्श्वनाथ का अनुवाद करवाया वह निम्नवत् है-
‘‘मैं ऐसा समझता हूँ – जहां प्रसिद्ध राजा अनंगपाल की श्रेष्ठ तलवार ने रिपुकपाल को तोड़ा, बढ़े हुए हम्मीर वीर का दलन किया, बुद्धिजन वृन्द से चीर प्रापत किया।
(बौद्ध सिद्धों की रचनाओं में एक स्थान पर ‘उभिलो चीरा’ मिलता है जिसका अर्थ है यशोगान किया, ध्वजा फहराई)।’
उक्त अर्थों से यही तात्पर्य है कि दिल्ली सम्राट अनंगपाल द्वितीय ने तुर्कों को पराजित किया।
यह तुर्क इब्राहीम ही था, जिसे निश्चय ही अनंगपाल ने पराजित किया और अपनी पताका फहराई।
इसी भाष्य का अनुवाद डॉ. दशरथ शर्मा ने इसका अर्थ प्रथम पंक्तियां प्राप्त हुए बगैर ही कर दिया और इस पूरे लेख को ही बदल दिया, जो कल्पना उन्होंने की अगर सभी इतिहासकार ऐसा करने लगेंगे तो न तो इतिहास मान्य होगा न ही दूर होगी भ्रांतिया।
डॉ. शर्मा चौहानों के इतिहासकार रहे हैं परन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं कि उनकी गलती को बार-बार दोहराया जाए किसी विद्वान से गलती हो सकती है परन्तु सभी से नहीं।
सम्राट अनंगपाल तोमर द्वितीय की मृत्यु(Died) और शासनकाल:-
अनंगपाल द्वितीय की मृत्यु 1081 ई. में हुई। अनंगपाल ने 29 वर्ष, 6 माह और अठारह दिनों तक दिल्ली पर शासन किया। अनंगपाल द्वितीय की मुद्राएं भी प्राप्त हुई है, जिसमें उसे “किल्लिदेवपाल” के नाम से जाना गया है।
सम्भवतः यह मुद्राएं अनंगपाल द्वितीय ने लौह स्तम्भ को दिल्ली में स्थापित करने के उपलक्ष्य में चलाई थी।
ठक्कुर फेरू ने दिल्ली की टकसाल की सभी तोमरों की मुद्राओं की जानकारी दी उसने लिखा है-
अणग मयणप्पलाहे पिथउपलाहे च चाहड़पलाहे।
सय मज्झि टंक सोलह रूप्पउ उणवीस करि मुल्लो।।
इन मुद्राओं में एक और अश्वरोही के ऊपर श्री किल्लिदेव लिखा तथा दूसरी ओर बैठे हुए नन्दी के ऊपर ‘पालश्री समन्तदेव’ लिखा है|
दोनों ओर के पाठ को एक साथ पढ़ने से समस्त पाठ ‘श्रीकिल्लिदेवपाल श्री समन्तदेव’ है। अर्थात् ‘किल्लिदेवपाल’ नाम है और ‘श्री समन्तदेव’ विरद।
सम्भवतः यह मुद्रा अनंगपाल द्वितीय ने 1052 ई. में जब ‘किल्ली’ लौह स्तम्भ को दिल्ली में स्थापित किया तब उसकी स्मृति में ये मुद्रा चलाई हो।
इतिहास में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है कि किसी राजा ने अपने राज्यकाल की किसी विशेष उपलब्धि की स्मृति में मुद्राएं जारी की हो|
यह संभव है कि अनंगपाल ने भी ‘जब लौहस्तम्भ’ किल्ली को अपने प्रांगण में गाढ़ा तब उसके उपलक्ष्य में यह मुद्राएं जारी की गई होगी।
अनंगपाल द्वितीय ने अन्य दो प्रकार की मुद्राएं भी ढलवाई थी।
एक प्रकार की मुद्राओं पर उनका नाम ‘अनंगपाल’ मिलता है और दूसरी मुद्राओं पर ‘श्री अणगपाल’। यह अणगपाल प्रयोग बहुत महत्वपूर्ण है।
अनंगपाल शुद्ध संस्कृत रूप है और अणगपाल पर हरियाणा की लोक भाषा का प्रत्यक्ष प्रभाव है।
मध्यकाल की हिन्दी की जन्म स्थली हरियाणा कुरुक्षेत्र ही है।
अनंगपाल द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् तेजपाल प्रथम दिल्ली के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुए।
महाराजा अनंगपाल द्वितीय के संदर्भ में अनेक प्रकार के भ्रम फैलाएँ गए हैं जो तथ्यहीन हैं जिनका खंडन अनेक विद्वान समय समय पर कर चुके ।
दिल्ली के तोमर राजाओं में केवल दो ही अनंगपाल हुए हैं , वे सर्वविदित हैं निर्विवाद हैं ।
इसके लियें देखे श्री द्विवेदी जी की पुस्तक “दिल्ली के तोमर” व “मेरी(डॉ महेंद्र सिंह तंवर) शोध पुस्तक जिसने विस्तार से इन सब मिथ्यो का खंडन किया हैं ।

क्षत्रियों के साथ विभिन जातियों का बहुत बड़ा योगदान रहा हैं । भारत में यह परम्परा रही हैं जिस क्षत्रिय वंश के साथ जो जो जाती के लोग रहते थे वे अपनी कुलदेवी व गोत्र उसी क्षत्रिय का मानते थे। वे कभी उस क्षत्रिय कुल से नही निकले परन्तु वे उनके साथ रहते थे |
इस कारण वे भी उसी परम्परा का निर्वहन करते थे ।
आज कल इन सभी के गोत्र आदि उस वंश के होने से उन्हें उस वंश से निकले बताना इतिहास सम्मत नहीं है ।
जो क्षत्रियों से निकले हैं वे इतिहास में अंकित हैं अतः यह धारणा पूरी तरह निराधार हैं ।
एक सन्देश उन सबके लिये जो राजपूत राजाओं को अपने कुल व जाति का बताकर राजनेतिक लाभ के लिये समाज में भ्रम उत्पन कर रहे हैं ।
वे ना केवल अपने कर्तव्य पथ से भटक रहे हैं बल्कि जिन राजपूत शासकों के कारण उनकी वंश की रक्षा हुई वे उस महान बलिदान को भुला रहे हैं ।
यह कृत्य उनके पतन का संकेत है जिसे उन्हें समजना चाहिये ।
भारतीय इतिहास का प्रत्येक वह शासक जिसने इस देश के गौरव एवं सनातन परम्परा तथा संस्कृति को सरंक्षण दिया जो इतिहास पुरुष हैं प्रेरणा के स्त्रोत हैं उन पर किसी एक का आधिपत्य कभी नहीं रहा क्योंकि वे सभी के ह्रदय में रचे बसे हैं ।
क्या हम भगवान श्री राम को, श्री कृष्ण को, भगवान बुद्ध को, महावीर स्वामी को कभी ह्रदय से निकाल सकते हैं ?
कभी नहीं ।
वे किसी ना किसी रूप में हमारे भीतर विधमान हैं ।
इसी प्रकार सम्राट विक्रमादित्य परमार, चन्द्रगुप्त मोर्य, चाणक्य, वराहमीर, राजा भोज, जगदेव परमार, नागभट, बप्पा रावल, महाराणा प्रताप, महाराजा शिवाजी, दिल्ली सम्राट अनंगपाल प्रथम व द्वितीय, कुमारपाल चालुक्य, पृथ्वीराज चौहान, कनौज नरेश जयचन्द एवं आधुनिक युग के स्वामी विवेकानन्द, रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आज़ाद, अश्फ़ाक, भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानी तो वही सुभाष चंद्र बोस ये सभी भारत की माटी के कण कण में रचे बसे हैं ।
इन्हें कैसे हम बाँट सकते हैं ।
सभी से यही अनुरोध हैं एकता में ही अनेकता हैं इतिहास को पढ़े नहीं बल्कि उसे आत्मसात करे मनन करे ।
राजनीति करने वाले आएँगे जायेंगे आप हम ओर समाज यही रहेगा । बाकी आपकी मर्जी
इतिहास गवाह हैं जो उसके विपरीत चला वह आज कहाँ हैं बताने की ज़रूरत नहीं ……..












One Response
हुकुम, बढ़िया लेख है। इसके अनुसार तो दिल्ली के तोमर यदुवंशी प्रतीत होते हैं । आप इस तथ्य पर प्रकाश दाल सकते हैं कि गवालियर के तोमरों में अपने पांडुवंशी बोलने कि रीति कब आरम्भ हुई? आपके अनुसार तोमर पांडुवंशी हैं कि यदुवंशी ?