दिल्ली संस्थापक अनंगपाल तोमर
दिल्ली संस्थापक तोमर(तँवर) अनगंपाल तोमर प्रथम ( 736-754 ई. )
डाँ.महेंद्रसिंह तँवर
अखिल भारतवर्ष के विगत दस हज़ार वर्ष के इतिहास में अनेक नगरों को भारतवर्ष की राजधानी होने का गौरव प्राप्त हुआ हैं , जिनमे प्रमुख हैं अयोध्या, हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ, मथुरा, काशी, मगध, कोसल, चेदि, उज्जैन, दिल्ली, आगरा आदि आदि ।
इन सभी में केवल एकमात्र नगर हस्तिनापुर हैं जिसके नगर क्षेत्र में अनेको नए नगर बसे ओर वहाँ पर समय समय पर नई राजधानियाँ बनी व उजड़ती गई ।
महाभारत काल में पाण्डव ( चन्द्रवंश ) वंशी चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण के आदेश पर इन्द्रप्रस्थ नगर की स्थापना की ।
यह नगर खाण्डव वन प्रदेश में बसाया गया था जो आज के दिल्ली एन सी आर से बहुत बड़ा तथा इसी क्षेत्र पर था ।
पाण्डवों ने कई शताब्दियों तक यहाँ शासन किया ।
विक्रम की सातवीं शताब्दी के पूर्व इन्द्रप्रस्थ के जलमग्न हो जाने पर “राजा क्षेमक” ने कोसांबी को अपनी राजधानी बनाया ।
पाण्डव अर्जुन के वंशज पाण्डव से “अर्जुनायन” कहे जाने लगे जिन्होंने सिकंदर के आक्रमण के समय भारत देश का पहला साका व जौहर किया, 327 B.C.E. में।
यहीं अर्जुनायन आगे चलकर अपने पूर्वज “राजा तुंग” के नाम पर तोमर कहे जाने लगे।
तोमरो ने कोशांबी के बाद चम्बल के किनारे “ऐसाह गढ़” को अपनी राजधानी बनाया जो वर्तमान में मूरैना जिले में हैं ।
ऐसाह के “राजा जाऊल” ने 736 ई. में इन्द्रप्रस्थ के पास अनगं क्षेत्र पर अधिकार कर वहाँ नया नगर बसाया जो अनगपुर कहा जाता था । इसी अनंग प्रदेश पर राज्य स्थापित कर राजा जाऊल ने अनंगपाल नाम धारण किया ।

अनंगपाल प्रथम ( 736-754 ई ) ने इस नगर का बहुत विस्तार किया ।
वे पाण्डवो के वंशज थे तथा जिस हस्तिनापुर इन्द्रप्रस्थ पर उनके पूर्वजों ने राज किया उसी प्रदेश पर तोमर वंश का राज्य क़ायम किया ।
यही प्रदेश आगे चलकर दिल्ली के नाम से विख्यात हुआ ।
दिल्ली के नाम के पीछे अनेक अनुश्रुतिया प्रचलित हैं ।
कुछ विद्वान “राजा दिलीप” के नाम पर दिल्ली होना बताते हैं तो कुछ इस प्रदेश कि भूमि के अधिक उपजाऊ व कोमल लचिली होने से “किल्ली ढिल्ली” कहते हैं ।
एक बहुत प्रसिद्ध अनुश्रुति “महाराजा अनगंपाल द्वितीय ( 1051-1081 ई )” के राज्य काल में विष्णुध्वज ( मेहरोली लोह स्तम्भ ) से जोड़ते हैं कहते यह लोहस्तंभ अनगंपाल द्वितीय ने स्थापित करवाया था |
तब ब्रह्मणो ने घोषणा की थी की यह स्तम्भ ऐसे समय काल में थापित हुआ हैं जो बहुत पवित्र क्षण हैं अर्थात यह लोहस्तंब शेष नाग पर जा टिका हैं |
अब तोमरो का राज्य हमेशा अचल रहेगा ।
यही बातें महाराजा को भ्रमित करती हैं वे लोहस्तंभ को निकलवा देते हैं । उसके शिरे पर ख़ून लगा होता हैं तब वह वापस विधि के साथ स्थापित किया जाता हैं लेकिन कहते हैं कि वह पहले की तरह अटल नहीं हैं वह ढीला लगा हैं तभी से यह कहावत चली “ कीली तो ढिल्ली तोमर भये मतहीन “ इस प्रकार तोमरो का राज सात पीढ़ियों के बाद छूट गया ।
यह किल्ली ढिल्ली ही इस दिल्ली के नामकरण कि कहानी है ।
महाराजा अनगपाल प्रथम दिल्ली में तोमर वंश के संस्थापक थे उन्होंने विशाल साम्राज्य की स्थापना की ।
अपने बीस पुत्रों में राज्य के अनेक भाग बाँट दियां जहाँ उन्होंने अपने अपने नाम पर नगर बसाये जो आज भी बसे हैं ।
मेजर जनरल कनिंघम ने एक अनुश्रुति के उल्लेख से लिखा हैं कि महाराजा अनगंपाल प्रथम के बेटे तेजपाल ने तेजोरा बसाया जो गुड़गाँव और अलवर के मध्य था |
दूसरे पुत्र इंदरराज ने इंदरगढ़ बसाया , तीसरे पुत्र रंगराज ने तारागढ़ , चोथे पुत्र अचलराज ने अचेवा ( अचनेर ) बसाया जो भरतपुर व आगरा के मध्य था , पाँचवे पुत्र द्रोपद ने असि ( हाँसी ) बसाई ।
महाराजा अनगंपाल के विषय में उनके न्याय को लेकर एक संदर्भ अमीरखुसरो ने अपनी कविता नूहसिपेहर में कही हैं जो 1318-19 ई . मे लिखी थी ।
इस कविता के चोथे सिपेहर में लिखा हैं –
“ मैंने एक कहानी सुनी हैं कि पाँच छः शताब्दी पूर्व दिल्ली में एक महान राजा अनगंपाल हुआ था । उसने अपने महल पर सिंहों की दो पत्थर की मूर्तियाँ बनवाई थी । उनमे प्रत्येक सिंह के पास दो घण्ठियां लगा दी थी जिसमें की न्याय का इच्छुक व्यक्ति उन्हें बजा सके । राजा उसको बुलाकर उसके कष्टों का निवारण कर सके ।

एक दिन एक कौआ घण्टी पर बैठ गया और उसमें चोंच मारने लगा तो राजा ने पुछवाया की अभियोगी कोन हैं ?
यह सब जानते हैं कि साहसी कोआ सिंहों के दाँतो के बीच से माँस चुन लेता हैं ।
पत्थर के सिंह तो शिकार नहीं हैं , तब कौए को भोजन कैसे मिल सकता हैं ?
राजा को विश्वास हो गया कि अभियोग सही है क्योंकि वह पत्थर के सिंहो के दाँतो में से माँस प्राप्त नहीं कर सकता |
उसने आदेश दिया कि कुछ भेड़े और बकरे काटकर डाल दिये जाए जिससे कौओ को कुछ दिन का भोजन मिल सके ।”
निश्चय ही कौओ के साथ किये गये न्याय की बात इतिहास सम्मत नहीं हैं और बकरे इस कारण काटे भी नहीं जाते थे ।
ये सिंह कालिका देवी के मन्दिर के सामने बने थे और बकरे उस देवी की बलि के रूप में काटे जाते थे ।
इस प्रसंग में सम्बंध और महत्वपूर्ण तथ्य यह हैं कि अमीर खुसरो के समय में अनुश्रुति पूर्णतः प्रतिष्ठित थी कि ईसा की 8 वीं शताब्दी में पाँच छह शताब्दियों के अंतराल का उल्लेख किया हैं|
उससे यह अनुमान होता हैं कि यह अनुश्रुति दिल्ली के संस्थापक अनंगपाल प्रथम के विषय में हैं ।
आज भी दिल्ली के कालिका देवी के मन्दिर के सामने दक्षिण की ओर पत्थर के दो सिंह बने हुए हैं जिनके सिर पर भारी घण्टे लटकते रहते हैं । इस मन्दिर की पुनः स्थापना 1768 ई में की गयी थी ।
अनंगपाल नाम के दो राजा दिल्ली के राजसिंहासन पर बैठे । अनंगपाल द्वितीय 16 वें शासक थे जो दिल्ली के 15 वे प्रतापी राजा कुमारपाल के ज्येष्ठ पुत्र थे।
उपरोक्त लेख मेरे शोध प्रबन्ध “ तँवर ( तोमर ) राजवंश का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास “ में विस्तार से लिखा हैं से लिया गया हैं ।

डॉ. महेन्द्रसिंह तंवर
सहायक निदेशक
महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश
शोध केन्द्र
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FAQ’s
प्रश्न- इतिहास में कितने अनंगपाल राजा हुए ?
उत्तर- 2, सम्राट अनंगपाल तोमर प्रथम तथा सम्राट अनंगपाल तोमर द्वितीय |
प्रश्न- सम्राट अनंगपाल प्रथम का नाम क्या हैं ?
उत्तर- सम्राट अनंगपाल तोमर (प्रथम) का नाम राजा जाऊल था |
प्रश्न- सम्राट अनंगपाल तोमर का शासनकाल क्या था ?
उत्तर- सम्राट अनंगपाल तोमर का शासनकाल 736ई. से 754ई. तक था |
प्रश्न- भारत का पहला शाका (जौहर और केसरिया) कब हुआ था ?
उत्तर- भारत देश का प्रथम शाका(साका) सिकन्दर के आक्रमण के समय 327 BCE में हुआ |
प्रश्न- B.C.E. का अर्थ क्या हैं ?
उत्तर- v=Before Common Era
प्रश्न- अनंगपाल नामक कितने सम्राट ने दिल्ली पर राज्य किया ?
उत्तर- 2
प्रश्न – दिल्ली के संस्थापक कौन थे ?
उत्तर- सम्राट अनंगपाल तोमर प्रथम दिल्ली के संस्थापक थे|
तोमर वंश पर अपनी शौध करने वाले डॉ महेंद्र सिंह जी तंवर द्वारा लिखी गयी इस पोस्ट आपको पसंद आई होगी |
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