एक ऐसा राजपूत जिसने बादशाह को युद्ध में गाली दी ओर उसकी पहचान उसकी पगड़ी से हुई जिसपर बादशाह ने उसे मारोठ का परगना इनायत किया ।
यह बात सम्वत् 1686 , सोमवार , 24 जनवरी 1631 ईसवी की हैं । बादशाह शाहजहाँ पर बाहर के बादशाह ने चार लाख की फ़ोज से हमला किया , तब शाहजहाँ आगरा से तीन लाख की सैना लेकर चढ़ा । उस समय जोधपुर के राजा गज सिंह जी भी पाँच हज़ार घुड़सवारों से साथ थे ।
उसी समय पूँजलोता गाँव के मेड़तिया राठौड़ रघुनाथ सिंह जी जो अपने पिता से नाराज़ होकर नवाब की फोज में अपने घोड़े के साथ आकर नोकरी करने लगे वे भी इस फोज में थे ।
जब दोनो सेनाएँ आमने सामने थी तभी एका-एक बादशाह का हाथी मुड़ कर पीछे भागने लगा तभी वहाँ घोड़े पर असवार मेड़तिया रघुनाथसिंह ने बादशाह के सामने आकर कटु शब्दों में बादशाह को फटकारा ओर कहा की इतनी सेना तो यहाँ घड़ी हैं ओर तू यहाँ से भाग रहा है, बादशाह अचंभित था ।
मारवाड़ की ख्यात में इसका विस्तार से वर्णन मिलता हैं । हम उन अपशब्दो का यहा उल्लेख नहीं करेंगे लेकिन इन शब्दों के बान बादशाह के ऐसे चुभे की वह युद्ध में लोट आया ओर इसी कारण युद्ध में शाहजहाँ की विजय हुई ।
युद्ध के बाद शाहजहाँ ने राजा गजसिंह जी को कहा की युद्ध में एक वीर ने कड़े अपशब्द कहे है में उससे मिलना चाहता हु । उस सारी फोज को उसी वैस भूषा मे खड़ा किया गया ।
बादशाह ने मेड़तिया रघुनाथ सिंह जी को उनके पगड़ी ( धूमाले -चोलड़े साफे ) से पहचान लिया । बादशाह ने कहा की फिर से वही शब्द कहो तब रघुनाथ सिंह जी ने कहा की “अब वह वक़्त ( समय ) नहीं तब “ बादशाह ने ज़ोर देकर कहा तब रघुनाथसिंह जी ने फिर वही अपशब्द कहे बादशाह बहुत प्रसन हुवा । उसी समय रघुनाथसिंह जी को मारोठ का परगना 112 गाँवो से दिया गया ।
इनके वंशज रघुनाथसिंघोत मेड़तिया कहलाते है ।
जोधपुर की ख्यात में इन्होंने जो अपशब्द कहे वे इस प्रकार है – “ अरे …………… चरख़ा कठे जाय छे , थनै काई सूजी छै । इतरा जाय सो तो थारा ही घट में भावेगा पिण , तै कठै भावेगा । हियाँ फूटा , थिर फ़ौज तो ऊभी छै ।”
गालियाँ देने पर जागीर मिले तो कहना ही क्या लेकिन इसे कब ओर कहा देनी है यह बहुत महत्वपूर्ण है ।










