भारत राष्ट्र के सुरक्षा प्रहरी के गौरव से विभूषित माड प्रदेश के रावल जैसल कि नगरी जैसलमेर के हज़ारों वर्षों से भारत वर्ष की सीमा के रक्षक का दायित्व निभाते आ रहे हैं ।इसी कारण जैसलमेर के भाटी नरेशों की उपाधि “उतर भड़ किंवाड भाटी” हैं जिसका अर्थ भारत की उतरी सीमा के रक्षक हैं भाटी ।यदुकुल के श्री कृष्ण भगवान के वंसज भटी ने गजनी तक साम्राज्य विस्तार किया था । इन्हि भटी के कारण यह वंश भाटी कहलाया ।जैसलमेर के भाटी सदैव राष्ट्र की रक्षा के लिये तो लड़े ही थे लेकिन उन्होंने अपनी प्रजा के लिए कभी पीठ नहीं दिखाई । इतिहास अनेक साके व जौहर करने का गौरव प्राप्त यह राजवंश अपनी प्रजा के कल्याण उसकी रक्षा ओर उसके सुख दुःख में पीढ़ियोंसे अपना बलिदान देता आ रहा हैं ।इस राजवंश के अन्तिम शासक जिन्होंने अखण्ड भारत के स्वपन को पूरा करने के संकल्प के निमित इस हज़ार वर्ष पुराने राज्य को भारत में विलय कर एक राष्ट्रभक्त का परिचय दिया था ।
जब 24 फ़रवरी 1948 में पाकिस्तान ने कबायलियो व लुटेरों कि फोज के साथ जैसलमेर पर आक्रमण किया तब इस राजवंश ने अपने पूर्वजों के राजधर्म ओर परम्परा का निर्वाह कर एक प्रजा प्रिय शासक के दायित्व का बख़ूबी निर्वहन किया ।उस समय की एक घटना जो इस राजपरिवार के प्रजा हितेशी व्यवहार की साख भरती हैं ।
जैसलमेर महाराजकुमार गिरधरसिंहजी साहब ने सबसे पहले जोधपुर महाराजा श्री हनवंतसिंहजी साहेब को तुरंत इस हमले कि सूचना तार से भेजी । महाराजा हनवंत सिंहजी साहिब ने उसी समय कर्नल मोहन सिंहजी भाटी ओसियां को अपना विशेष विमान देकर जैसलमेर रवाना किया तथा ब्रिगेडियर ज़बरसिंहजी को आदेश दिया कि जैसलमेर कि सहायता के शीघ्र फोज तयार करके भेजे ।कर्नल मोहन सिंहजी ने जैसलमेर पहुँच महारावल साहिब को ओर राजपरिवार को साथ लेकर विमान से जोधपुर चलने लिए कहा । इस पर महारावल साहिब ने जवाब दिया कि वे अपनी प्रजा को संकट में छोड़ कर नहीं जा सकते ।बहुत कहने भी महारावल साहिब नहीं माने ।यह था जैसलमेर राजपरिवार का अपनी प्रजा के प्रति प्रेम । उन्होंने कहा की वे जैसी भी परिस्थाति होगी अपनी प्रजा साथ रहेंगे । आज यदि में अपने परिवार के साथ चला गया तो मेरे कुल की परम्परा का क्या होगा । इस राज्य की राजगद्दी पर बैठते समय जो मेने प्रतिज्ञा की उसका क्या होगा ।
राजपरिवार ने अपना राजधर्म निभाया । कर्नल मोहनसिंहजी भाटी ने अपना कर्तव्य । जैसलमेर से देवा की ओर उड़ान भरकर पाकिस्तान की ओर से आ रहे हमलावरों की टो लेने हवाईं जहाज से उनके ऊपर उड़ान भरी । हवाई जहाज को देख कर हमलावर घबरा कर वापस पाकिस्तान कि ओर भागने लगे ।उस समय ऊँटो व घोड़ों पर तीन सौ चार सौ हमलावर थे जो शस्त्रों के साथ थे । उनके पीछे भी बहुत लोग दिखाई दिये । वे हवाई जहाज को देख घबरा गये ।एक दो हवाई जहाज के चकर लगा कर कर्नल मोहनसिंह जी जोधपुर लोट आये ।ऐसा था जैसलमेर राजघराने प्रजा प्रेम । यही कारण है कि आज सत्तर वर्ष बाद भी इस राजपरिवार ओर प्रजा का अटूट बन्धन क़ायम है ।
महारावल बृजराजसिंहजी साहिब के निधन पर जैसलमेर कि प्रजा ने अपने महारावल के शोक में श्रद्धा भाव प्रकट करने के लिए जिस अपार जन सैलाब के साथ बड़े युवा स्त्री पुरुष बच्चो ने हज़ारों संख्या में उपस्थित होकर अश्रुपुरित जो श्रद्धांजली अर्पित है वह इस राजपरिवार के प्रजा प्रेम का ही परिणाम है ।आज इस अपार जन सैलाब के बीच स्वर्गीय कर्नल मोहनसिंहजी के पोत्र मृगेंद्रसिंहजी कि। उपस्थिति ओर जोधपुर महाराजा साहिब के प्रतिनिधि की उपस्थिति ने राजशाही के स्वच्छ वातावरण को पुनः जीवित कर दिया ।इस घटना ने बहुत से पुराने घावों को भी हरा कर दिया हैं जो हमारे लोकतंत्र के प्रथम राज के सुख भोगने वालों की मानसिकता को भी उजागर करता हैं। जिस प्रकार जैसलमेर के राजपरिवार ने पाकिस्तानी आक्रमण की सूचना भारत सरकार को न देकर सबसे पहले अपने पड़ोसी राज्य मारवाड़ को दी जिसके परिणाम स्वरूप तुरंत जोधपुर महाराजा ने सहायता भेजी ओर पाकिस्तान अधिकृत जैसलमेर बनने से बच गया दुसरी तरफ़ कश्मीर के महाराजा ने भारत सरकार से पाकिस्तान के आक्रमण के समय सहायता माँगी तो भारत सरकार ने सहायता के बदले मोल भाव करने लगी परिणाम हम सबके समक्ष हैं पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर यह फ़र्क़ हैं राजतंत्र के राजाओं में ओर आज़ाद भारत लोकतंत्र में । दुःख इस बात हैं की उस समय सभी राजा सरदार पटेल की बात नहीं मान कर भारत सरकार के साथ किए गए सन्धि पत्रो को सयुक्त राष्ट्र में रजिस्टर करवा दिया होता तो बाद के नेताओ की वादाखिलाफ़ी से तो बच्चा जा सकता । अंग्रेज़ो ने तो दो सौ वर्षों तक वादा निभाया लेकिन स्वतंत्र भारत के नेताओ ने तो केवल बीस वर्ष में ही प्रीवी पर्स ख़त्म करके अपने दोगले चरित्र को दिखा दिया ।हरी ॐ










