जोधपुर(मारवाड़) के शासको का इतिहास

राव सिहो जी

राव सीहा (सिंहसेन) कन्नौज “से यात्रा के लिये द्वारिका चले उसने गोत्र हत्या बहुत की थीं, इससे मन विरक्त होने पर अपने पुत्र को राजपाट सौंप वह 101 राजपूत ठाकुर आदि को साथ ले पैदल ही चल पड़ा , मार्ग में वह गुजरात में ठहरा, जहाँ चावड़े व सोलंकी राज ‘करते थे । उनकी राजधानी पाटण (अणहिलवाड़ा) थी । उंन्होंने उसका स्वागत किया और उससे सिंध के मारू लाखा जाम राजा के साथ अपने वैर की बात कहकर उससे लाखा को पराजित करने में सहायता मांगी राव सीहा ने उन्हें आश्वासन दिया और द्वारिका से लौटने पर लाखा के साथ युद्ध करने का वचन दे उन्हें फौजें इकट्ठी करने का आदेश कर उसने द्वारिका की ओर प्रयाण किया , एक मास बाद लौटने पर उसका लाखा से युद्ध हुआ, जिसमें लाखा अपने भानजे राखायत के साथ काम आया , अनन्तर पाटण में पहुंचने पर चावडों के यहाँ उसका विवाह हुआ, कन्नौज लौटने पर चावडी रानी से उसके तीन पराक्रमी पुत्र हुए, कुँवरों के कुछ सयाने होने पर राव सीहा का परलोकवास हो गया । ‘
राव सिहो जी बदायू के राठौड़ के वंशज थे , जो राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग के वंशज थे , वि. स. 1253 में बदायू मुस्लिम के हाथों में चला गया था जिससे सेतराम एवम उनके पुत्र सिहो जी मारवाड़ में आ गए तभी से इनके वंशज मारवाड़ जोधपुर , बीकानेर ,किशनगढ़ ,ईडर, रतलाम ,सितामहु, झाबुआ रियासते एवम इनसे निकले ठिकाने , जागीरी में बसे हुए है|
राव सिहो जी सर्वप्रथम बीकानेर से 20 मिल पश्चिम कुलुमद के सोलंकी सरदार के यहाँ गये, जिसने उनका बडा आदर किया ,उसके बदले में उसने लाखा फूलाणी से युद्ध करने में उक्त सरदार की सहायता की, जिसमें लाखा की पराजय हुईं, सोलंकी सरदार ने इसके एवज में अपनी बहन उनको ब्याह दी | वहॉ से लौटते हुए अणहिलवाड़ा पाटण में उनका ‘अच्छा स्वागत हुआ । वहाँ फिर लाखा फूलाणी से सामना होने पर राव सिहो जी ने उसे अकेले ही मारा ,अनन्तर उन्होंने मेवा (महेवा) के डाभियो तथा खेड़धर (खेड) के गोहिलों पर विजय प्राप्तकर खेड़ में अपनी राजधानी स्थापित की ।
 उनके तीन पुत्र हुए
♦1.आस्थान (अश्वथामा)
♦2.सोनिंग (ईडर का शासक हुआ)
♦3.अज
 

राव सिहा जी का राणीवास

1. राणी सोलंकणी , सोलंकी मूलराज की लडकी
जिसके 2 पुत्र हुए
अस्थान ओर अज

2. राणी चावडी सोभागदे धौलबगहराबोत्त की लड़की । जिसकै पुत्र दो हुए
1. सोनग
2 . भीम
और एक कन्या रूपबाइं हुई जो बालकपन में गुज़र गई

3. राणी चहुंवाण बलीराव लाखणोत की लडकी, “सो पति कै पिछे सती हुई ।
4. राणी देवड़ी
5. राणी जाड़ेची सती हुई
6. राणी भटियाप्पी कैल्हणी सती हुई
सीहाजी का पुत्र रामसेन बालपन में गुजरा जिसकी छतरी गढ गोयंदाणा मे और पितरो मे हुआ है ।
 
“राव आस्थान जी का इतिहास और जानकारी “

राव आस्थान जी

राव आस्थान जी राव सिहो जी के बाद पाट बिराजे
अम्बर रुधो तारहि , धर रुंधी राठौड़
छोहिल मोहिल चावड़ा , सोलंकी ने गौड़
एता कतधज मारिया, पाली बाँधा मोड़
सीहा की मृत्यु के उपरांत, उसका उत्तराधिकारी उसका ज्येष्ठ पुत्र आस्थान हुआ उस समय वह पाली के पास गुंदोज नामक गांव में था वहा आसपास के कुछ गांवों पर सीहा जी का अधिकार हो गया था आसथान को उत्तराधिकार में वे गांव मिले , परन्तु इतने से ही वह संतुष्ट नहीं था , वह अपने पिता से भी बढकर महत्वाकांक्षी था , उसके दिमाग में अपने पिता की राज्य स्थापना और वंश विस्तार की योजना चक्कर काट रही थी, इसलिए उसने अपने भाइयों की सहायता से प्रजा की रक्षा करने में असमर्थ गोहिल राजपूतों से वि .सं .1336 में खेड़ छीन कर नियमपूर्वक वहां राठौड़ राज्य की स्थापना की इसी कारण इसके वंशज खेड़ेचा कहलाए, खेड राज्य में उस समय 340 गांवों का होना ख्यातों से पाया जाता है खेड़ के गोहिल गुजरात के सोलंकी शासकों के सांमत थे, जो अत्यन्त निर्बल हो चुके थे , सीहा जी और उसके पुत्रों ने उस क्षेत्र की जनता की सेवा कर के तथा उसको पीडित करने वाले दस्युओँ का विनाश करके सर्वप्रथम उसका विश्वास प्राप्त किया । ओर उसके बाद उनके प्रजा के दुःख निवारण और सुरक्षा में असमर्थ रहने बाले अयोग्य शासकों को हटाकर वहाँ अपना अधिकार स्थापित किया । इस कार्य में उनकी सेवा से आभारी जनता की सहानुभूति उनके साथ थी, जिससे वे पूर्ण सफल हो सके ।
ऐसा मालूम होता है कि खेड राज्य को सुदृढ करने के उपरांत आसथान ने अपने भाइयों सोनग और अज को सहायता देकर गुजरात के ईंडर और ओखामण्डल में दो नवीन राठौड राज्यों की स्थापना की । आसथान ने थोड़े ही समय राज्य किया था, परन्तु उसने अपने शासन के लगभग 18 वर्ष के अल्पकाल में राठोडों के दो राज्यो की स्थापना करके बहुत बडा काम कर डाला था । आस्थान जी के देहांत के विषय में भूतपूर्व जोधपुर राज्य की ख्यात मेँ लिखा है कि कुछ दिनों के उपरांत बादशाह फिरोज शाह ने मक्का जाते हुए पाली को लूटा । इस पर आस्थान जी ने खेड़ जा कर उससे युद्ध किया और उसी युद्ध मे पाली के तालाब के निकट वि. स. 1348 में अपने 140 राजपूतो सहित वीरगति को प्राप्त हुए .

राव आस्थान जी के पुत्र एवं राणीया :-

1.राणी गोयलांणी (खेड के गोयलों की पुत्री)
2.राणी उछरंगदे इन्दी (परिहार राजपूत)
इनके पुत्रों के नाम ख्यातों में भिन्न-भिन्न मिलते हैँ ।
आस्थान के आठ पुत्र के नाम है :-
1.धूहड़,
2.धांधल,
3.चाचक,
4.जोपसा,
5. आसल,
6.खींपसा,
7.हरखा
8.पोहड़
जोधपुर राज्य ( भूतपूर्व) की ख्यात में भी आठ पुत्र लिखे हैँ, परन्तु नामों में फर्क है । हरखा को उसने हिरड़क लिखा है । दयालदास ने छ: लिखे हैं जिनमें
चाचिक, जोपसा, आसल, खींपसा, हरखा व पोहड़ में से कोई-सा भी नाम नहीं है । धांधल व धूहड़ के अलावा सिंघल, बाहुप, चन्द्रसेन व उड नाम दूसरे हैं । आसौपा ने आसथान से तेरह शाखाएँ कायम हुई लिखी हैं जिनमें से सात तो उसके पुत्रों,
धूहडियां, (धुहाडिया राठौड़ कहलाये)
धांधल,(धांधलोत राठौड़ हुए लोक देवता पाबु जी इसी शाखा के राठौड़ थे)
चाचक,
आसल,
खीपंसा,
हरखाबत
पौहड़ 
तथा छ: शाखाएँ उसके पौत्रों (जौपसा) के पुत्रों से निकली :-
1.सिंधल ( सिंधलोत राठौड़ कहलाये)
2.ऊहड़ (उहदोत राठौड़ कहलाये, राव जोधा के समय कोरणा गांव इन्हें राठौड़ की जागीर थी)
3.जोलु (इनके वंशज जोलूराठौड कहलाये)
4.जोरा ( इनके वंशज जोरावत राठौड़ कहलाये)
5.राजग ( इनके वंशज राजिग राठौड़ कहलाये)
6. मूलराज ( इनके वंशज मोलोत (मुलु) राठौड़ कहलाये)
“राव धूहड़ जी का इतिहास और जानकारी “

राव धूहड़

राव आस्थान जी के बाद गद्दीनशीन हुए
अपने पिता राव आसथान का उत्तराधिकारी होकर खेड़ की जगद्दी पर बैठा ।
धूहड़जी गांव बालसौसर गये, उस समय ईदो से जाकर कहा कि ‘ ‘ आवो ग्याभण मामा मिलो । ‘ ‘ तब ईदो की बहन ने कहा “ ‘ आवो अदेवता भाणेज़ ‘ ‘ तब धूहड़जी ने कहा हम अदेवत्ता कैसे तब उसने कहा अपनी मांजी से जाकर पूछो । उन्होंने अपनी माताजी से आकर पूछा कि यह बात कैसे है तो उसने कह दिया तुम्हारे देवता कर्णाटक में है इसको यह मालूम नहीं कि यह भाग कर आई हुईं है ‘ ” ईदी जापो जाने घी वैसंदर लावो ‘ ‘ सो यह एक पडिहार और कुछ ‘ ‘ भूई ‘ ‘ और राजपूतों को साथ लेकर अपनी कुलदेवी चक्रेश्वरी को लेने को कर्णाटक को चढा । वहां से देवी को लेकर आये,
कुलदेवी चक्रेश्वरी की मूर्ति लाकर गांव नागाणा (वर्तमान जिला बाडमेर) मेँ स्थापित की , जो बाद में नागणेची, कहलाई । अपने भाई धांधल को कोलूमढ़ (वर्तमान तहसील फलौदी, जिला जोधपुर) जागीर में दिया तथा अपने पैतृक राज्य में 140 गांव और मिलाकर उसमें बृद्धि की , इससे राठौड वंश की पाँच शाखाएँ औंर फैली । धूहड़ की मृत्यु वि. स. 1666 में चौहानों के साथ युद्ध में गांव तिरसंगडी (वर्तमान जिला बाडमेर) के पास हुई । टॉड ने लिखा है कि मण्डोवर लेने के प्रयत्न में पडीहारों के हाथ से उसकी मृत्यु हुई परन्तु यह सही नहीं है । मण्डोर उस समय पडिहारों के पास नहीं, मुसलमानों के अधिकार में था, जो वि.सं. 1351 से चला आ रहा था । अत : चौहानों के साथ युद्ध होने वाली बात ही सही है
धुहड़ जी के पुत्र :-
1.रायपाल
2. कीर्तिपाल
3.बेहड़(कटारमल)
4.पीथड (हाक बंबाल)
5.जोगा (जोगाईत)
6.चंद्रपाल (जोलु)
7.बेगड़
“राव रायपाल जी का इतिहास और जानकारी “

राव रायपाल

रायपाल राव धूहड़ का जेष्ठ पुत्र था जो खेड़ को राजगद्दी पर बैठा । इसने भयंकर अकाल के समय जनता को अन्न आदि से बडी सहायता की थी, इसी कारण “जनता ने इसे महिरेलण (इन्द्र ) क्री उपाधि दी थी । इसी के समय अलाउद्दीन खिलजी ने बि .सं. 1368 में जालोर चौहानों से छीन लिया था और वहाँ ‘पठान हाकिम नियुक्त कर दिया था । उन्ही दिनों में रायपाल ने चौहानों को हराकर बाडमेर अपने राज्य मेँ मिला लिया था ।
रायपाल ने परमारों का ठिकाना बाड़मेर 560 गाँवों के साथ जीता और यादववंशी राजपूत मांगा को सर्वस्व दे अपना भिक्षुक (चारण) बनाया , वि. सं. 1290 में महेवे (मालानी)पर रायपाल अधिकार हो गया, अनन्तर उसने पाबूजी को मारने में साथ देने वाले कुंडल के स्वामी को परास्त किया और वि.सं. 1291को 8 4 गाँवों के साथ उस प्रदेश को भी अपने राज्य में मिला लिया रायपाल ने मंडोर (मंडोवर) के पडिहार स्वामी को मारकर अपने पिता की मृत्यु का बदला लिया कुछ” समय तक उक्त प्रदेश पर उसका अधिकार भी रहा

राव रायपाल के पुत्र:-

1. कान्हाराव 2.केलण (इनके वंशज केलनोत राठौड़ कहलाये) 3.राजसी (इनके वंशज राजसिहोत राठौड़ कहलाये) 4.मोहन( ये मुहणोत कहलाये) 5. महिपाल ( ये महिपालोत कहलाये) 6. शिवराज ( इनके वंशज सिवराजोत राठौड़ कहलाये) 7. सोढल (इनके वंशज सोढ़लोत राठौड़ कहलाये) 8. बलु ( ये बलुओत कहलाये) 9. रामसिंह ( इनके वंशज रामसीहोत राठौड़ कहलाये) 10. डॉगी ( ये डांगी राठौड़ कहलाये इनके वंशज ज़्यादा नही है)

राव रायपाल का राणीवास

1. राणी अतेवर रानादे भटियाणी राणा सोमवत की कन्या
2.राणी रंगादे देवडी संग्रामसिह लूणावत की कन्या वड़गांव की ।
3. राणी रामादे केल्हन
4. राणी ऐची चहुवाण सामंत्तसी मैरांवत्त की कन्या
“राव कान्हापल जी का इतिहास और जानकारी “

राव कान्हापल

राव रायपाल के बाद पाट बैठे यह ज़्यादा समय तक नही रहे जल्द इनका देहात हो गया था । इन्होंने खेड पर राज किया और बड़े प्रतापी राव हुए .

राव कान्हा के पुत्र :-

1.भीमकर्ण ( जैसलमेर से युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हुए) 2. जालणसी 3.विजयपाल 4. लूणा

राव कन्हा का राणीवास

1. राणी कल्यान्दे देवड़ी
“राव जालण जी का इतिहास और जानकारी “

राव जालण जी

राव कान्हा के बाद उनके छोटे पुत्र उनकी जगह पाट बिराजे राव जालण ने खेड़ पर राज किया , एवं बड़े प्रतापी शासक थे.
राव के जेष्ठ पुत्र भीमकरण जैसलमेर के पास लोदरवा (काक नदी) के पास युद्ध मे काम आये थे , इस कारण कन्हपाल के उपरांत उसके छोटे पुत्र उत्तराधिकारी हुए । भूतपूर्व जोधपुर राज्य की ख्यात में लिखा है कि जालणसी ने उमरकोट ( सिंध ) के सोढी और मुल्तान के शासकों पे चौथ वसूल की । जब महेवे(मालाणी) पर हाजी खां पठान ने चढाई की, तब जालणसी ने उसका सामना किया और उसे हराया ओर पालनपुर पहुँच के हाजी मालिक को मारा, इस वर्णन मेँ आसपास के गावों से चौथ वसूल करना भी लिखा है , जालणसी की इस बढती हुई शक्ति को देखकर भाटिर्यों और सिंध के मुसलमानों की सम्मिलित सेना ने उस पर आक्रमण किया, जिनसे लड़कर जालणसी ने वि .स .1285 में वीरगति प्राप्त की .

राव जालण जी के पुत्र

इनके तीन पुत्र थे 1. छडा जी 2. भाखरसी 3.डूंगरसी

जालण जी का राणीवास

1.राणी जमनादेवी (चौहान सातल की पुत्री) 2.राणी वीरादे (नारायण गहलोत की पुत्री)
“राव छडा जी का इतिहास और जानकारी “

राव छडा जी

राव जालणसी की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र छड़ा उनके उत्तराधिकारी हुए, जोधपुर राज्य की ख्यात में उसके विषय में लिखा है…-‘ मृत्यु के समय जालणसी ने अपने पुत्र छड़ा से कहा था कि सोढ़ो पर हमारा दंड निकलता है, सो दुर्जनसाल सोढा से वसूल करना है छड़ा ने इस पर चौगुने घोड़े और चौगुना दंड वसूल किया, अनन्तर उसने जैसलमेर के भाटिर्यो से कहलाया कि गढ़ के बाहर गाँव बसाया है, अतएव हमें अपनी पुत्री तथा नालबंधी दो, पर यह बातें भाटियों ने स्वीकार न कीं, तब उसने जैसलमेर पर चढाई कर दी तो उन्होंने अपने यहॉ की बेटी उसे व्याह दी, वहाँ के रावल जैतसी (तेजराव का पुत्र) ने उसका सामना किया, पर भाटी युद्ध में जम न सके, जिससे छाड़ा की विजय हुईं और जैसलमेर नगर की लूट में उसके हाथ बहुत माल अस्वाब लगा । उसी वर्ष उसने उमरकोट पर चढाई की और सोढ़ो को अपना आश्रित बनाया । फिर उसने महेवे(मालाणी) को नुकसान करने वाले भीनमाल के सोनगरों पर चढाई की, भीनमाल के क्षेत्र पर छाडा के समय मुसलमानों का अधिकार थो । छाडा का जैसलमेर के भाटिर्यो, सिंध के सोढ़ो से और पालो, सोज़त, भीनमाल और जालोर इत्यादि अपने पडोसियों पर आक्रमण करते रहना पाया जाता है । इसी सिलसिले में जालोर प्रांत के रामा गांव के पास सोनगरों और देवडा चौहानों ने उसे अचानक धोके से आ घेरा, जिस पर वहां विं .सं .1401 में युद्ध हुआ और उस युद्ध में राव वीरगति को प्राप्त हुए.

राव छड़ा के 7 पुत्र थे:-

1. तीडा 2.खोखर (इनके वंशज खोखरिया राठौड़ कहलाये) 3.वानर (इनके वंशज वानरोत राठौड़ कहलाये) 4. सीमाल (इनके वंशज सिहमलोत राठौड़ कहलाये) 5.रुद्रपाल(उदल) 6.खीपसा 7.कन्हड़देव
राव छड़ा के 7 पुत्रों में 3 पुत्रो की ही शाखाये प्रसिद्ध हुई.

राव छड़ा का राणीवास:-

राव के एक ही राणी थी जिसे हुलणी राणी कहा जाता था इसी राणी बसे सात पुत्र हुए थे.
“राव तिडा जी जी का इतिहास और जानकारी “

राव तिडा जी

राव छाडा के जेष्ठ पुत्र तिडा अपने पिता की राजगद्दी पर बैठकर विजय प्रयाण किया, क्योंकि छडा के समय राठौड राज्य कुछ अस्त-व्यस्त हो गया था । तीडा ने समस्त महेवा(मालाणी) प्रांत पर अधिकार करके राज्य व्यवस्था को सुधारा,
राव तिडा ने भीनमाल में सामन्त सिह सोनगरा से युद्ध किया सोनगरा हार खाकर भागा राव ने उसका किया पीछा किया सोनगरा राव की पुत्री राजकुमारी सुबली भी युद्ध में साथ थी । उसके रथ कौ राठोडों ने जा घेरा । तीडा ने आगे आकर रथ को मोड़ने की आज्ञा दी , तो राजकुमारी ने कारण पूछने पर राव ने उत्तर दिया कि मैं तुझे ले जाकर अपनी राणी बनाऊंगा । राजकुमारी ने कहा कि यह तभी हो सकता है जब तुम मेरे पुत्र को युवराज करो राव ने इसको मंजूर किया और राजकुमारी को घर लाया ,उसके एक पुत्र कान्हड़देव हुआ जो युवराज नियुक्त हुआ
राव ने मालाणी के साथ कितने ही समय तक भीनमाल पर राज्य किया और वहाँ के सोनगरे स्वामी के यहाँ जबरन विवाह किया । इसके अतिरिक्त उसने सिरोही के स्वामी, लोदरवा के भाटियो तथा सोलंकियों से दंड वसूल किया और बालेचों से अपनी चाकरी कराई राव ने सोनगरों और देवडो से प्रतिशोध लिया ,सिवाना के स्वामी चौहान सातल और सोम, इसके भानजे थे । उन पर जब अल्लाउद्दीन व मुसलमानों ने आक्रमण करके सिवाना को घेर लिया तो उनकी सहायता के लिए तिडा ने बड़े पुत्र सलखा सहित अपनी सेना लेकर सिवाना पहुँचा ओर युद्ध किया इस युद्ध मे तीडा वीरगति को प्राप्त हुए। ओर उनके पुत्र सलखा को धोके से बन्दी बना लिया गया।
तिडा के तीन पुत्र हुए:- 1. सलखा (जेष्ठ पुत्र) 2. त्रिभुवनसी 3. कान्हडदेव
“राव कान्हड़देव जी का इतिहास और जानकारी “

राव कान्हड़देव

राव तीडा के बाद उनके पुत्र कान्हड़देव पाट बैठे , राव तिडा के जेष्ठ पुत्र सलखा जी थे ओर तिडा ने अपने शासन काल मे सलखा को एक जागीरी दे दी थी जिसका नाम सलखावासी था, लेकिन अपने पिता के साथ युद्ध के दौरान उन्हें धोके से बन्दी बना लिया गया ओर उनके पिता ने कान्हड़देव को युवराज बनाने का वचन दिया था जिस वजह से कन्हड़देव पाट बैठे , लेकिन कान्हड़देव खेड़ का स्वामी नही बनना चाहता वह उसके बड़े भाई को ही स्वामी मानता था , जिस वजह से वह अपने भाई की बड़े पुत्र मल्लीनाथ को अपने साथ रखता ओर उसे राज्य का प्रधान बना दिया था,
कान्हड़देव ने त्रिभुवनसी को बैठवासिया नाम की जागीर दी थी, कुछ समय बाद कान्हड़देव का देहांत हो गया और त्रिभुवनसी ने खेड़ पर अधिकार करने की कोशिश की लेकिन सफल नही हो सके
राव कन्हड़देव के कोई संतान नही थी
“राव सलखा जी का इतिहास और जानकारी “

राव सलखा

राव तिडा के जेष्ठ पुत्र थे लेकिन युद्ध के दौरान इन्हें बन्दी बना लिया था तब बाहड़ ओर बिजड नाम के दो पुरोहित योगी का भेष धारण कर गुजरात गए और वहा के मुस्लिम शासक को सलखा को मुक्त करने को कहा और कहा कि अब इनका राज्य खत्म हो चुका है ये कमजोर है इस लिए वहा के शासक ने इन्हें कमजोर समज लिया और मुक्त कर दिया वहां से ये खेड़ आये तब खेड़ का सारा राज काम सलखा का बड़ा पुत्र माला(मल्लीनाथ) देख रहा था उस समय कान्हड़देव का देहात हो गया था उसकी जगह सलखा खेड़ के पाट बैठे खेड़ पर मल्लीनाथ का अधिकार हो गया था और अपने पुत्र मल्लीनाथ द्वारा प्राप्त खेड़ के राज्य का स्वामी हो गये, शायद इसके बाद ही उसने नगर की ओंर का क्षेत्र वापिस लिया और वहां का प्रबंधक अपने पुत्र मल्लीनाथ को बनाया,मल्लीनाथ नगर में ही रहता था और अपने पिता की मृत्यु के उपरांत भी वहीं रहा।
इस प्रकार राव सलखा समस्त महेवे प्रांत का स्वामी होकर वहां का शासन करता रहा । सलखे ने राव की पदवी धारण कर आठ वर्ष खेड पर राज्य किया और अपने वीर पुत्रों के बल पर अपना राज्य बढाया और सुदृढ किया
मुसलमान राठोडों के बढते हुए प्रभाव को रोकना चाहते थे, जैसलमेर के भाटी भी इनकी विस्तारवादी नीति के विरुद्ध होकर मुसलमानों को मित्र रूप में सहायता देते थे । इस लिए कुछ समय के बाद में सिंध के मुसलमानों ने सलखा पर एक जबरदस्त आक्रमण किया राठौडों ने भी इसका डट के मुकाबला किया यद्यपि सलखा इस युद्ध में वीरगति को गए , परन्तु खेड़ का राज्य मुसलमान नहीं छीन सके उस पर राठौड़ का ही अधिकार रहा.
राव सलखा के पुत्र नही था एक दिव वह वन में शिकार के वास्ते गया और दूर जा निकला साथ में लोग सब पीछे रह राये । जब तृषा लगी तो जल की खोज में इधर उधर फिरने लगा एक स्थानं पर उसने धुआँ निकलते देखा जब वहॉ पहुंचा तो देखता क्या है कि एक तपस्वी बैठा तप कर रहा है । इसने. उसके चरण छूकर अपना नाम ठाम बतलाया और कहा कि प्यासा हूँ कृपा का थोड़ा जल पिलाइए , तपस्वी ने कमंडल की तरफ इशारा करके कहा कि इसमें जल है, तूभी पी ले और अपने घोडे को भी पिला । सलखा ने जलपान किया, घोड़े को भी पिलाया और देखा तो कमंडल ज्यों का त्यों भरा हुआ है, तब तो उसने जाना कि यह कोई सिद्ध है । हाथ जोड विनती करने लगा कि महाराजा आपकी कृपा से और तो सब आनंद है परंतु एक पुत्र नहीं है जोगी ने अपनी झोली में से भस्म का एक गोला निकाला और 4 सुपारी दी और कहा यह भस्म और सुपारी राणी को खिलाना, उसके 4 पुत्र होंगे ,पहले पुत्र का नाम मल्लिनाथ रखना सलखा गोला और सुपारी ले घर आया, राणियों को खिलाया, गर्भ रहे और 4 बेटे हुए, तब जोगी के आज्ञानुसार’ ज्येष्ठ पुत्र का नाम मल्लिनाथ रखा, और उसे जोगी का भेष धारण कराके युवराज बनाया .

राव सलखा के चार पुत्र हुए थे:-

1.रावल माला( मल्लीनाथ)
2.वीरम
3.जैतमल (इनके वंशज जैतमलोत राठौड़ कहलाये)
4.सोभित (इनके वंशज सोहड़ राठौड़ कहलाये जो मैलाणा जागीरी में है)

राव सलखा का राणीवास:-

सलखा के तीन राणीया थी जिनसे चार पुत्र हुए थे
1. राणी जाणिदे (मुंजपाल चौहान की पुत्री)
2. राणी जोइया (धिरदेव जोईया की पुत्री)
3.राणी गोरज ( जयमल गहलोत की पुत्री)
“रावल माला (मल्लीनाथ)जी का इतिहास और जानकारी “

रावल माला (मल्लीनाथ)जी

राव सलखा के बाद उनके जेष्ठ पुत्र माला खेड के पाट बैठे,
माला ने नगर को राजधानी बनाकर भिरड़गढ़ नामक किले को अपना निवास स्थान बनाया
उस समय दिल्ली में फिरोजशाह तुगलक का शासन था जालोर, नागौर ओर मण्डोवर में मुसलमानी थाने थे गुजरात और मालवे में दिल्ली की और से नियुक्ति सूबेदार थे सिंध पर भी मुसलमानों का अधिकार था,
जैसलमेर में महारावल केहर मेवड़ मेँ महाराणा खेत व लाखा थे,
दिल्ली का मुसलमानों का क्रेन्दीय शासन फिरोजशाह की काजी मुल्लाओं से प्रभावित नीति के कारण अवनति की और अग्रसर होने लगा था । गुजरात और मालवे के सूबेदार स्वतंत्र होने की सोचने लगे थे । मालवे में सूबेदार दिलावर खां उर्फ अमीशाह गौरी गुजरात में जफर खां , जालोर के मुसलमानी थाने में मलिक दाऊद नामक हाकिम, नागौर में खोखर जलाल खा और मण्डोवर के अधिकारी का नाम स्पष्ट नहीं है, परन्तु सम्भव है कि उस समय यह थाना सिंध के सूबेदार कुतुबमुल्क के अधीन रहा हो ,” ऐसा पाया जाता है ।
मल्लीनाथ बडा सफल शासक और राठौड राज्य महान उन्नायक राजा प्रमाणित हुआ, महेवे प्रदेश की राजगद्दी पर बैठकर उसने सिवाना का किला मुसलमानों से छीन लिया और वह अपने छोटे भाई जैतमाल को जागीर में दे दिया । उससे छोटे भाई विरमदेव को खेड़ की जागीर दी सबसे छोटे भाई सोभत को ओसियां की जागीर दो, परन्तु थोड़े ही समय में वह उसके हाथ से निकल गई नगर और भिरड़गढ़ किला मल्लीनाथ ने अपने अधिकार में रखा था । इस प्रकार की उसकी राज्य व्यवस्था की व्यूहरचना उसकी राजनीति के आगे सब झुकने लगे जेसलमेर के भाटियो और जालोर, सिंध एव मण्डोवर के मुसलमानों ने राठौड राज्य के उखाड फेंकने में काफी जोर लगाया, परन्तु वे असफल रहे अंत में मुसलमानों को वहां से चले जाने पर विवश होना पडा, ओर भाटियों को हथियार डालकर सन्धि करना पड़ी।
मल्लीनाथ नाथ पथ के अनुयायी थे, उनके गुरु रतननाथ योगी ने माला से उनका नाम मल्लीनाथ रखा और रावल की उपाधि दी, ओर सब उन्हें रावल कहकर सम्बोधित करने लगे यह उनकी शासकीय उपाधि प्रसिद्ध हो गई इनके पूर्वजो को उपाधि राव थी।
माला ओर मुसलमानों से युद्ध मे सभी कवि के मत:-
1.मुहणोत्त नैणसी:- रावल माला ने दिल्ली और मांडू के बादशाहों की फौजों से युद्ध का उन्हें हराया ।
2.रामकरन आसोपा :- बादशाहों ने मण्डोवर के थाने की शिकायत पर मल्लीनाथ पर सेना भेजी, उस सेना के नेता अपनी सेना के 13 तुंगे बनाकर आक्रमण किया । रावल मल्लीनाथ ने भी अपनी सेना ठीकठाक बना कर सामना किया । मरुभूमि की पर बादशाही सेना को पीडित होकर पीछे लौटना पडा
3.प. विश्रेबरनाथ रेऊ:- रावल मल्लीनाथ जी एक वीर पुरुष थे । जब इन्होनें मण्डोर, मेवाड़, आबू और सिंध के बीच लूटमार कर मुसलमानों को तंग करना शुरू किया, तब उनकी एक बडी सेना ने इन पर चढाई की उस सेना में 1 3 दल थे , परन्तु मल्लीनाथ जैसे बहादुरी योद्धा से उसका सामना किया कि तो यवन सेना को मैदान छोड़ कर भाग जाना पडा , इस पराजय का बदला लेने के लिए मालवे के सूबेदार ने स्वयं इन पर चढाई की, परन्तु मल्लीनाथ की वीरता और युद्ध कौशल के सामने वह भी सभी टिक नी सके ।
4.जगदीशसिंह गहलोत: रावल मल्लीनाथ बड़े वीर थे । उन्होंने बादशाही फौजों के 13 दलों को परास्त किया था
5.जोधपुर राज्य की ख्यात : रावल मल्लीनाथ बडा शक्तिशाली था । उसने मण्डोर, मेवाड़, सिरोही और सिंध आदि देशों का बड़ा बिगाड़ किया । इस पर दिल्ली के अलाउद्दीन ने उस पर फौज भेजी, जिसमें तेरह तुंग थे , महेवे की हद्द मैं लडाई हुईं , जिसमें अल्लाउद्दीन को हार मान के भागना पड़ा मल्लीनाथ की विजय हुई और बादशाह की फौज़ भाग गई .
उस समय राठौडों पर हुए मुसलमानों के इस आक्रमण को इसलिए महत्वपूर्ण मानते हैं कि यह आक्रमण राठौडों के अस्तित्व को चुनौती देने चाला था । यदि इसमें राठौड़ पराजित हौ जाते, तो राजस्थान में उनका अस्तित्व ही मिट जाता, सिंध के मुसलमान ओर जैसलमेर के भाटी उनके स्थाई शत्रु थे ही, मालवा और गुजरात के सूबेदार उनकी बढती हुईं शक्ति को बडी शंका की दृष्टि से देखते थे । मेवाड, चाहे एक और पड़ता हो औंर वह अपनी स्थिति पर संतोष करके चुप रह रहा हो, हमारी राय में वह राठौड़ की विस्तारवादी योजना से राजी नहीं था । मेवाड वाले अपने उत्तर की और बढने में राठौडों को जरूर अवरुद्ध रूप समझते थे । इस विषम स्थिति को मल्लीनाथ ने समझा और अपनी समस्त शक्ति से इस आक्रमण का सामना किया,
चारो तरफ़ से मुस्लिम आक्रमण जेसमलमेर ,उमरकोट ,ओर मेवाड़ के विरोध के बाद भी मल्लीनाथ ने राठौड़ वंश के गौरव के बनाये रखा और एक के बाद एक युद्ध विजय करते रहे अंत मे सभी ने मल्लीनाथ से हार मान कर शांत हो कर बैठ गए और राठौड़ वंश की विजयध्वज लहराता रहा.
रावल मल्लीनाथ के 9 पुत्र थे:-
1. जगमाल
2. जगपाल
3. कुम्पा (इनके वंशज कोटडिया राठौड़ कहलाये)
4.मेहा
5. चुण्डराव
6.अड़वाल
7.उदेसी
8.आरडकमल (इनके वंशज बाडमेरा राठौड़ कहलाये)
9.हरभू
“राव वीरमदेव जी का इतिहास और जानकारी “

राव वीरमदेव

वीरमदेव राव सलखा का छोटा पुत्र था मल्लीनाथ और जैत्तमल से छोटा था । वह बड़ा वीर, साहसी और निडर व्यक्ति था । दानी, उदार और परोपकारी भी था,
महान दानी स्वभाव का व्यक्ति था । अपने पास बहुत से राजपूत रखता था, जिससे इतनी-सी जागीर से उसका निर्वाह नहीं हो रहा था । इसलिए जब धन की आवश्यकता होती, वह डाके भी डालता था, परन्तु यह कहीं नहीं पाया गया कि उसने प्रजाजनों को कमजोर या गरीब को लूटा हो, वह मुस्लिम शाही काफिलों और उनकी पेशकसी आदि को लूटता था , राव विरम राठोड़ राज्य का एक विशिष्ट स्तम्भ और मल्लीनाथ का परम सहायक था ,मल्लीनाथ के साथ मुसलमानी आक्रमण के युद्ध में वीरमदेव शामिल था और बडी वीरता से लडा था, जगमाल के कार्यभार सम्भालने से पहले मल्लीनाथ के राज्य का कर्ताधर्ता प्राधन विरम ही रहा है ,जब जगमाल ने राज़ कार्य में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ किया और विरम के भाई जैतमाल के धोखे से मार डाला तब वीरमदेब भिरड़गढ़ से पलायन कर अपनी जागीर में चला गया , उदा सांखला और जोइयो को शरण में रखकर उनका रक्षा करने के सिलसिले में जब जगमाल और मल्लीनाथ से इसकी अनबन हो गई , तो यह वहां से पहले तो वीरमपुर नाम का एक पृथक ग्राम बसाकर वहां रहने लगा और जब वहां से भी मल्लीनाथ व जगमाल ने निकल जाने का कहा , तो खेड का इलाका त्यागकर थली (रेगिस्तान) के इलाके (शेरगढ़ परगना) की और चला गया । वहाँ सेतरावा आदि 26 ग्रामों पर अधिकार करके अपनी बडी पत्नी सांखली और उससे उत्पन्न पुत्र देवराज, जयसिंहदेव और विजयसिह को छोड़कर स्वयं ने नागौर की और प्रयाण किया जोइयों को पहुंचाने के लिए जब पहली बार वीरमदेव सहवाण की ओर गया था, उसी समय सेतराव के इलाके पर अधिकार कर लिया था उसी समय मार्ग में कुण्डल (फलौदी परगना) के भाटी बैरीमाल की पुत्री से विवाह किया था । इस यात्रा से वापिस आकर फिर खेड़ का त्याग किया था और नागौर की और गया था क्योंकि वीरमदेव जब जोइयों को पहुंचाकर वापिस आया, जोइयों ने अपनी बछेरी समाध उसको दे दो थी । यह बछेरी जोइयों ने उनके खेड़ में रहते समय जगमाल व मल्लीनाथ ने मांगी परतु उन्हें नही दी जिससे वे ओर ज़्यादा नाराज़ हो गए,
उस समय मंडोर के मुसलमानों ने विरम पर आक्रमण किया लेकिन उन्हें हार मान कर भागना पड़ा ,उंसके बाद विरम ने मुसलमानों की पेशकश लूटकर जांगलू चला गया ,
कुछ समय बाद जोइयो से अनबन हो गई उंसके चलते उन्होंने विरम की गाये चुरा ली ओर कहा कि विरम स्वयं आ कर हमसे लड़ेगा इस बात पर विरम ने उनसे जा कर लड़ाई की गाये तो छुड़वाली लेकिन उसमें विरम वीरगति को गए

राव विरम के 5 पुत्र हुए:-

1. देवराज (इनके वंशज देवरजोत राठोड कहलाये, इनके 6 पुत्र हुए एक पुत्र चाहड़देव से चाहड़देवोत राठौड़ की शाखा निकली)
2.जयसिंह
3.बीजा(विजयसिंह)
4.चूंडा
5.गोगादे

विरम देव का राणीवास:-

1.भटीयाणी राणी जसकुवंर
2.राणी मांगलियाणी
3. राणी चंदन
4.राणी लांछा इन्दावत
“राव चूंडा(चामुंडराय)राव वीरमदेव जी का इतिहास और जानकारी “

राव चूंडा(चामुंडराय)

चूंडा जी विरम के छोटे पुत्र थे लेकिन बाकी सभी पुत्रो में ज़्यादा पराक्रमी थे चूंडा के बारे में हम यही कह सकते है कि एक मात्र चूंडा की ऐसे योद्धा हुए जिसने राठौड़ वंश का एक मजबूत राज्य और शासन स्थापित किया , राव चूंडा एक महान दानी राजा थे वे आने जाने वालों का बहुत आदर सत्कार करते थे ,माँ चामुंडा के बड़े भक्त थे देवी ने उन्हें दर्शन भी दिए और चूंडा को निर्भय रहने को कहा वरदान दिया। राव चुंडा से पहले राठौड़ वंश की राजस्थान में जनसंख्या और भूमि की दिशा में काफी वृद्धि हुई परन्तु रावल मल्लीनाथ के देहांत के उपरांत उसकी राज्य शक्ति का ह्यस हुआ राव वीरमदेव की मृत्यु हो जाने से राठौडों की मानो महान शक्ति की क्षति ही हो गई , एक समय तो राठौड राज्य छिन्न-भिन्न हो गया था,परन्तु उसी समय विपरीत काल में वीरमदेव के वंश में एक ऐसे भाग्यशाली और कर्मठ वीर का जन्म हुआ कि जिसके कारण राठौड राज्य के अस्त हुए “सूर्य का पुन: उदय हुआ, ओर वह महान योद्धा था राठौड़ चामुंडराय(चूंडा) उसका खेड राज्य के सलोड़ी में हुआ, उसके बचपन में ही उसके पिता राव वीरमदेव को खेड राज्य से निष्कासित होना पड़ था ,तीन वर्ष वह अपने पिता के साये में रहा जोइयावाटी में उसके पिता की मृत्यु होते ही वह घोर संकटों में घिर गया , यद्यपि उसके बड़े भाई गोगादेव, देवराज आदि विद्यमान थे परन्तु वे इससे दूर पड़ गए थे और उनकी बुद्धिमान माता मांगलियाणी ने देव प्रदत्त विपत्तियों की परवाह न करके अपने इस होनहार पुत्र को जोइयों और जगमाल से छुपाकर रखना चाहती थी और उसने बड़े साहस के साथ अपने इस संकल्प को निभाया , चूंडा की माता अपने इस पुत्र क्रो लेकर अपने पीहर या सौत के पुत्रों के पास नहीं गई , गुप्त रूप से आल्हा चारण के घर कलाऊ या खिरजां में रही और विपत्ति के विकट पहाडों को पार किया, बचपन में चूंडा ने झोंपडी में रहकर चारण की गायों को चराए , जब वह लगभग बारह वर्ष का हुआ, चारण के सामने अपने वास्तबिक रूप में प्रकट हुआ, एक बार चूंडा व्रक्ष के नीचे सोया था तो चूड़े के चेहरे पर एक सर्फ़ अपने फन की छाया कर बैठ था , यह सब नज़ारा आल्हा चारण ने देखा और समाज गया कि ये साधारण व्यक्ति नही है आगे चलकर ये छत्रधारी राजा बनेगा , आल्हा ने उसे रावल मल्लीनाथ के दरबार में पहुंचा दिया मल्लीनाथ ने उसे अपने पास रख लिया और थोड़े दिनों के बाद उसे पहले तो अपने राज्य को कच्छ की और सीमा के थाने पर भेजा और फिर उगमसी इंद्रा की संरक्षण में सालोडी के थाने पर भेज दिया , मल्लीनाथ ने यह भांप लिया था कि चूंडा होनहार है और वह आगे बढेगा इसलिए सालोडी भेजते समय उसे आशिर्वाद देते हुए यह आदेश दिया था कि अपनी पश्चिम की ओर पैतृक भूमि का मोह त्यागकर पूर्व की और बढना जगमाल चूंडा को नहीं चाहता था और मल्लीनाथ द्वारा उसको कच्छ की सीमा के थाने पर भेजने के विरुद्ध था , इसलिए शायद मल्लीनाथ ने चूंडा को कच्छ की सीमा के थाने से हटा कर मण्डोर ओर नागौर की मुसलमान थानों की सीमा पर भेज दिया मल्लीनाथ जानते थे कि जगमाल चूंडा पर घात करेगा इसलिए चूंडा को उससे दूर रखता था, मल्लीनाथ को यह भी आभास हो गया था कि जगमाल से अब राठौड़ राज्य की वृध्दि नहीं होगी और चूंडा महत्वकांक्षी युवक था और वो राठौड़ राज्य को आगे ले जा सकता है, कच्छ की और के थाने पर रहते समय चूंडा ने सिंध की और के मुस्लिम शासकों के घोड़े छीनकर अपने राजपूतों में बाँट दिए थे, जिनका मूल्य मल्लीनाथ को चुकाना पडा था इस कारण जगमाल के कहने से मल्लीनाथ ने चूंडा को अपने राज्य से निकाल दिया था जिस पर वह इंदों के पास जाकर रहा था । इंदों में उगमसो बडा बुद्धिमान था,कच्छ की सीमा पर चूंडा उसी के संरक्षण में रहा था । उस समय चूंडा को उसने समझ लिया था कि वह एक होनहार व्यक्ति है । इसलिए वह चूंडा को चाहता था और प्राण से उसकी सहायता करना चाहता था, इंदों की 84 गांवों की जागीर उस समय मडोवर के मुसलमानी थाने के मातहती में थी और उन्हीं के रिश्तेदारों कोटेचों, आसायचों व सखलो की चौरासियां भी इसी थाने के अधीन थी, पडोस में जैतारण सिंघल राठौडों के अधिकार में था इस प्रकार राजपूतों का उस क्षेत्र में अच्छा जोड़ था, चाहे चूंडा मल्लीनाथ द्वारा सलोड़ी के थाने में रखा गया हो, चाहे वह खेड़ राज्य से निष्कासित होकर इंदों कै पास रहता हो,लेकिन चूंडें ने इन आसपास राजपूतों से सम्पर्क अवश्य बढाया और उस समय की राजनीतिक स्थिति को देखकर मण्डोर पर अधिकार करने की योजना बनाई । उस समय भारत की राजनीतिक स्थिति बडी डावांडोल हो चुकी थी और उसका प्रभाव राजस्थान पर भी पड़ रहा था, दुबारा व मण्डोवर व जालोर के थाने लड़खडा उठे थे । राठौडों को बढने का अच्छा अवसर मिल गया था; परन्तु उनके पहले से संगठित राज्य खेड़ का शासक जगमाल अपने ही भाइयों को गिराने की मातों में ’उलझकर इतना गिर गया था कि अपने राज्य को बढाने में अयोग्य हो चुका था । परन्तु चूंडा ने समय का फायदा उठाकर मण्डोर मुसलमानो से छीनकर परिहार को लौटा दिया जिस पर मण्डोर के परिहार शासक ने सोचा की परिहार से अब मण्डोर नि संभलेगा ये सोचते हुए उन्होंने इनकी पुत्री राजकुमारी मोहली का विवाह राव चूंडा से करके मण्डोर उन्हें देहज में दे दिया और मण्डोर एक बड़ा राठौड़ वंश का राज्य बना मण्डोर के बाद चूंडा ने नागौर भी मुसलमानों से छीन लिया और वहा रहने लगा , आल्हा बारहठ को चूंडा ने ख़िरज गांव दान दे दिया बारहठ का सम्मान कर लाख पसाव दिए , चूंडा जी ने इसके बाद डीडवाना , ओर मोहिल पर आक्रमण कर लाडनू भी अपने अधिकार में ले लिया मोहिल ने अपनी पुत्री चूंडा को ब्याह कर सन्धि की बाद में पूंगल के भाटी ने केलण ने मुल्तान के शासक सलमान खान की सहायता ले कर चूंडा पर आक्रमण कर दिया और नागौर को घेर लिया और चूंडा ने अपने बड़े पुत्र को यह कहकर भेज दिया कि ये भाटी अब युद्ध करके मानेगा तो में पीछे नही हटूंगा ओर उंसके मरने के बाद पाट उनके छोटे बेटे कान्हा को बिठाए उंसके बाद राव चूंडा अपने 10-12 राजपूत के साथ मुल्तान की सेना का मुकाबला करने चल दिये और उस युध्द में राव चूंडा वीरगति को प्राप्त हुए.

राव चूंडा के 14 पुत्र थे:-

1. रणमल 2.सातल 3.रणधीर( इनके वंशज रणधीरोत राठौड़ कहलाये) 4. भिव 5. आरडकमल(इनके वंशज आरडकमलोत कहलाये) 6.पूना 7.वीजा 8.कन्हा (इनके वंशज कन्हावत राठौड़ हुए) 9.अज 10.शिवराज 11. लूम्भा 12. रामदेव 13. सहसमल( इनके वंशज सहसमलोत कहलाये) 14. रावत

चूंडा जी का राणीवास:-

1. राणी सांखली (विसल की पुत्री) 2. राणी तारादे 3.राणी भटीयाणी 4. राणी सोना मोहली (ईसर दास इंदा की पुत्री) 5. राणी केसर दे