राजस्थान में जौहर एवं शाकों का एक गौरवशाली इतिहास रहा हैं । यहाँ राजपूत वीरों ने समय-समय पर जहाँ दुश्मनों से मुक़ाबला करते हुए कई शाके किये वहीं राजपूत रमणियों ने आत्म सम्मान की रक्षा के लिये जौहर की ज्वाला में कूद कर अपनी जीवन लीला समाप्त की ।राजस्थान का इतिहास ऐसे जौहरों एवं शाकों से भरा पड़ा हैं चाहे जैसलमेर हो चाहे चितौड़ , रणथंबौर , जालोर ओर सिवान हो यहाँ एक से बढ़कर एक जौहर शाके हुए हैं । दुश्मनों को यहाँ केवल ख़ाक ही हाथ लगी ।ऐसी इस पावन धरा पर पहला शाका तनोट में हुवा था जो राजस्थान का पहला शाका था । यह 841 ई. में हुआ था । दूसरा शाका एवं जौहर जैसलमेर के भाटियो ने 1294 ई . मे किया ।यह युद्ध लुटेरे ख़िलजी व भाटी जैतसी के मध्य हुवा था । तीसरा शाका एवं जौहर 1301 ई. में रणथंबौर में हुवा । रणथंबौर के चौहानो ने लुटेरे अलाउद्दीन ख़िलजी से कड़ा मुक़ाबला किया तथा अंत में उन्होंने आत्म गौरव के लिये शाका किया एवं राजपूत वीरांगनाओं ने जौहर कर अपने आत्म सम्मान कि रक्षा की ।चौथा शाका एवं जौहर चितौड़ में 1303 ई. में हुवा।
लुटेरे अलाउद्दीन ख़िलजी ने चितौड़ पर आक्रमण किया तब राणा रतनसिंहजी ने मेवाड़ी वीरों के साथ शाका किया एवं वीरांगना राणी पद्मिनी ने दो हज़ार स्त्रियों के साथ जौहर कर इतिहास में अमर हो गयी। उस अलाउद्दीन ने 30 हज़ार हिंदुओं को क़त्ल करवाया था ।पाँचवा 1305 ई. मी जैसलमेर के क़िले में लुटेरे अलाउद्दीन ख़िलजी के आक्रमण के समय हुवा । भाटी राजपूतों ने रावल दुदा जी के नेतृत्व में क़िले के द्वार खोलकर कर केशरिया धारण कर शाका किया ओर राजपूत स्त्रियों ने अग्नि की धधकती ज्वाला में कूद कर जौहर किया । यह जैसलमेर का तीसरा शाका व जौहर था जो वहाँ के भाटीयों ने किया था।छठा जौहर एवं शाका 1308 ई. में जालोर के चौहान शासक कान्हड़देव एवं उनके वीर पुत्र राजकुमार वीरमदेव जी ने लुटेरे अलाउद्दीन ख़िलजी के आक्रमण के समय वीरता पूर्वक लड़ते हुए किया था तथा अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लियें वीरांगनाओं ने जौहर कर राजपुती आन बान का परिचय दिया ।सातंवा जौहर सन 1534 ई. में चितौड़ में हुवा । यह चितौड़ का दुसरा जौहर था । राजपूत बड़ी वीरता से लुटेरे गुजरात के लुटेरे शासक बहादुर शाह से लड़े कर किया ।उस समय 13000 हज़ार राजपूत स्त्रियों ने राणी कर्णावती के नेतृत्व में चितौड़ के दुर्ग में जौहर कर अपने आत्म सम्मान की रक्षा की ।आठवाँ जौहर व शाका जैसलमेर में रावल लुणकरण जी के समय 1550 ई. में कन्धार के लुटेरे शासक अलीखां के आक्रमण के समय किया था।नोवाँ जौहर चितौड़ में हुवा । यह चितौड़ का तीसरा जौहर था । इस बार मुग़ल लुटेरे अकबर ने आक्रमण किया था तब राणा उदयसिंह जी के वीर योद्धा जयमल जी मेड़तिया व फता सीसोदिया के नेतृत्व में यह जौहर 1568 में किया था ।दसवाँ जौहर व शाका रोहड़ी दुर्ग ( वर्तमान में पाकिस्तान में ) में हुवा था । यह दुर्ग उस समय भाटी राजपुतो के अधीन था । 1702 ई में सिन्ध के बलेच लुटेरो ने आक्रमण किया तब वहाँ के वीरो ने केशरिया धारण शाका किया , वीर ललनाओं ने जौहर कर अपने आत्म गौरव की लाज रखी ।भाटी वंश का यह पाँचवा शाका व जौहर था । इसी कारण जैसलमेर के राजवंश का गौरव आज भी जनमानस में उतना ही सम्माननीय हैं । इसका जीवन्त प्रमाण लोकतंत्र के 70 वर्ष पश्चात भी वर्तमान महारावल के निधन पर आम जन सैलाब ने उन्हें श्रधांजलि अर्पित की हैं इसके पीछे इस महान वंश का गौरवशाली उज्ज्वल इतिहास हैं ।राजस्थान भारतवर्ष का एक ऐसा प्रान्त हैं जहाँ के राजपूत वीर वीरांगनाओं ने इतिहास में अपने आत्म गौरव के लियें जो बलिदान दिया हैं वह युगों युगों तक भारतीयों के मन मस्तिष्क में रहेगा ।यही वह त्याग ओर बलिदान हैं जिसके समक्ष सभी के सर इन बलिदान स्थलों पर झुकते हैं इससे बड़ा क्या हम सब के लियें आत्म गौरव हो सकता हैं ।









