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राजवंश

“स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयो न्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते|| ३१ ||”

क्षत्रिय होने के नाते अपने विशिष्ट धर्म का विचार करते हुए तुम्हें जानना चाहिए कि धर्म के लिए युद्ध करने से बढ़ कर तुम्हारे लिए अन्य कोई कार्य नहीं है | अतः तुम्हें संकोच करने की कोई आवश्यकता नहीं है |
अध्याय 2 श्लोक 31
आज हम यह जानते हैं कि आर्य लोग  अफगानिस्तान, पाकिस्तान सहित सम्पूर्ण पश्चिम, उत्तर व पूर्व भारत में नर्मदा नदी पार तक उन्होंने अपनी बस्तियॉ  बसाई थी । इन आर्यों में से कुछ सूर्यदेव को , कुछ चंद्रमा को व कुछ अग्नि देव को अपना आदिम पूर्वज व स्वयं को इनका वंशज मानकर इन तीनों देवताओं की पूजा करते थे । इस प्रकार प्राचीन आर्य व उनके  प्रमुख पूर्वज क्रमश: “सूर्यवंशी ”, “चन्द्रवंशी ” व “अग्निवंशी ” कहलाये। छठवीं शदाब्दी ईस्वी में ईंस्लाम के  आगमन के  पूर्व ईरान, अफगानिस्तान के  लोग इन्हीं तीन देवताओं क्री आराधना करते थे । 
 भारत के  सम्मान्य परिवारों तथा राजपरिवारों दोनों में यह परम्परा रही है , कि पिता के  मरने के  पश्चात बड़ा पुत्र परिवार का मुखिया या पुराने राजा का उत्तराधिकारी बनता था व बाकी छोटे भाई उसके अधीन या नियंत्रण में रहते थे। राजपरिवारों में राजा के  अन्य छोटे भाइयों को राज्य में महत्वपूर्ण पद जैसे प्रधानमंत्री, सलाहकार, सेनापति आदि के  पद या गुजर-बसर के  लिये छोटे राज्य या जागीरें दे दी जाती थीं । जिन लोगों को  ये छोटे राज्य या जागीरें दो जाती थीं, उनके  वंश का नाम उन्हें पाने चाले प्रथम पूर्वज कं नाम से चलता था । जिन राजपुरुषों को  ये राज्य या जागीरें नहीं मिल पाती थीं वे अपनी सेना इकट्ठी कर अपने बाहुबल से पास या दूर का क्या इलाका जीतकर वहाँ अपनी सत्ता स्थापित कर लेते थे और उनके नाम से उनके  वंश या कुल का नाम चलने लगता था । आज़ का विज्ञान हमें यह बताता है कि सीधा सूर्यं, चन्द्रमा या अग्नि से मनुष्य रूपी सन्तानें उत्पन्न होना असम्भव है।
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